हर नन्हा पौधा जब इस जमीन से बाहर निकलता है तो एक बच्चे के समान आश्चर्य से इस दुनिया को देखता है,इसी आस के साथ के एक दिन वो भी सबकी तरह बड़ा होगा और इसी दुनिया को बहुत ऊपर से देखेगा। हमेशा आसमां छूने की चाह में उसे निहारता है।हर नयी सुबह कुछ नयी पाखुरियों के साथ कितने ही नए अरमान लिए जागता है,अपने ऊपर गिरी ओस की बूंदों से उनकी बातें करता है।अपनी ही धुन में मस्त बस बढ़ता जाता है इस बात से अनभिज्ञ के कल जाने किस इन्सान की जरूरत उसके सपनो पर भरी पड़ जाए और उसका अस्तित्व इस दुनिया से हमेशा के लिए मिट जाए।
ऐसी ही दास्ताँ है उस बूढ़े पेड़ की जिसने सारा जीवन उस इन्सान की सेवा में लगाया जो उस पेड़ को उसके अंत समय में भी अपने आँगन में जगह न दे पाया।
अचानक से आँखें भर आई जब मैंने उस पेड़ को कटते देखा। उसकी खूबसूरती आँखों को अपनी ओर खीचती थी,बुढ़ापे की वजह से उसकी शाखाएँ झुककर जमीन से मिलने लगी थी। उस दिन वो शांत,उदास सा खड़ा था। शायद किसी उम्मीद में था या शायद सोच रहा था के उसका कसूर क्या है,क्या बस इतना के अपना सर्वस्व उसने उसी मानव के लिए लगा दिया जो उसे बहुत निर्ममता से काट रहा था या इतना के वो हर मौसम चाहे पतझड़ हो या बारिश, धूप हो या सर्दी हमेशा अडिग खड़ा रहा,जड़ से लेकर पाखुरी तक सिर्फ उसे देता रहा,ना कभी कुछ माँगा ना शिकायत की,ना रूठा कभी ना परेशान किया पर फिर भी वही मानव उसके साथ ऐसा कर रहा था।
जाने कैसे भूल गया वो अपना बचपन जब उसी पेड़ की डालियों पर वो झूलता था,उन्ही के साथ खेलता था। कैसे भूल गया वो पल जब उसी के नीचे आकर बैठता था,उसके मीठे फलो से भूख मिटाता था और छाव से थकान। शायद अब उसकी जरूरतें उस पेड़ से ज्यादा बढ़ गई थी।
जाने कैसे भूल गया वो अपना बचपन जब उसी पेड़ की डालियों पर वो झूलता था,उन्ही के साथ खेलता था। कैसे भूल गया वो पल जब उसी के नीचे आकर बैठता था,उसके मीठे फलो से भूख मिटाता था और छाव से थकान। शायद अब उसकी जरूरतें उस पेड़ से ज्यादा बढ़ गई थी।
उस पेड़ के काटने से सिर्फ मैं या वो पेड़ ही उदास नहीं था एक और भी था जो दुखी था पर सिर्फ ऊपर से देख रहा था और कुछ सोच रहा था......
"क्यूँ ढूंढ़ना पड़ता है एक नया साथी "
उस पेड़ की वो नन्ही- नन्ही डालियाँ,
करती थी अठखेलियाँ
चाँद के साथ....

पीती थी उसकी चांदनी को,
मद्धम मद्धम झूम के
झुलाती थी उसकी किरणों को।
रात भर
चलता था ये खेल
और हर नयी सुबह से
वो इंतज़ार करतीं,
कि चाँद आज रात फिर आएगा।
आज वो डालियाँ
किसी क घर का दरवाज़ा हैं
या किसी के घर का सामान,
पर चाँद का खेल बदस्तूर जारी है
एक नए साथी
एक नए पेड़ के साथ।
इसी सोच में....
कि शायद
कल कोई नया साथी ढूंढ़ना पड़े।


gud yar................superb..........h ......what a mind........????
ReplyDeletevery touchy. really liek it.. keep wriitng gunja. jus do take care of one thing - jab likhte ho na to apne liye mat likho - aap ek aam aadmi ke likh rhe ho ye soch kar likhna............... god bless u.
ReplyDeletethank u bhaiya........ I will take care about dis....
DeleteVery nice lines mam!!! really hats off to you...:)
Deleteamezing gunju.... as just a reader..mujhe to ek bhi glti najar nhi aayi
ReplyDeletereally touchy.. good job done..keep it up always..:)
luv u dear;;)))
thank u di......luv u 2...:)
Deletefabulous.... really nice lines ....i feel that i ma reading lines written by a great writer....
ReplyDeleteHey add mine lines to it too .
नीचे घास पर पड़ी ओंश की बुँदे ..
मरुत के वेग से उर्जित होकर बंसी बजती डालें ..
उन पर बैठे परिंदे ,,,,
मानो एसा लगता ह जैसे संगीत की महफ़िल जमीं हो ..
स्वर पर्तिकाएं संगीतकार डालें गा गाकर मेहमानों को आनंदित कर रही हों ,,
चुप चाप खड़ा मैं यही देख रहा था जब प्रकर्ति के उस दस्यु ने उस लहलहाती डाले काटकर निचे गिरा दी .
परिंदे उड़ गए
असीम आनंद के वह द्रश्य दर्द और विदाई से भर गया । अपने अस्तित्त्व को खोते हुए वह पितृ वृक्ष उनको पुकारता रहा ..
पर परिंदे चले गये थे नए आश्रय्र की खोज में , एक नै महफ़िल की खोज में ,
"एक नए साथी की खोज में"
very nice...
ReplyDeleten the poem is really good
will be looking forward for next blog update...
Kya baat .... kya baat........KYA BAAT......
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