Sunday, July 22, 2012

SAVE TREES- They also want to Live



हर नन्हा पौधा जब इस जमीन से बाहर निकलता है तो एक बच्चे के समान आश्चर्य से इस दुनिया को देखता है,इसी आस के साथ के एक दिन वो भी सबकी तरह बड़ा होगा और इसी दुनिया को बहुत ऊपर से देखेगा। हमेशा आसमां छूने की चाह में उसे निहारता है।हर नयी सुबह कुछ नयी पाखुरियों के साथ कितने ही नए अरमान लिए जागता है,अपने ऊपर गिरी ओस की बूंदों से उनकी बातें करता है।अपनी ही धुन में मस्त बस बढ़ता जाता है इस बात से अनभिज्ञ के कल जाने किस इन्सान की जरूरत उसके सपनो पर भरी पड़ जाए और उसका अस्तित्व इस दुनिया से हमेशा के लिए मिट जाए।







ऐसी ही दास्ताँ है उस बूढ़े पेड़ की जिसने सारा जीवन उस इन्सान की सेवा में लगाया जो उस पेड़ को उसके अंत समय में भी अपने आँगन में जगह न दे पाया।


 


     अचानक से आँखें भर आई जब मैंने उस पेड़ को कटते देखा। उसकी खूबसूरती आँखों को अपनी ओर खीचती थी,बुढ़ापे की वजह से उसकी शाखाएँ झुककर जमीन से मिलने लगी थी। उस दिन वो शांत,उदास सा खड़ा था। शायद किसी उम्मीद में था या शायद सोच रहा था के उसका कसूर क्या है,क्या बस इतना के अपना सर्वस्व उसने उसी मानव के लिए लगा दिया जो उसे बहुत निर्ममता से काट रहा था या इतना के वो हर मौसम चाहे पतझड़ हो या बारिश, धूप हो या सर्दी हमेशा अडिग खड़ा रहा,जड़ से लेकर पाखुरी तक सिर्फ उसे देता रहा,ना कभी कुछ माँगा ना शिकायत की,ना रूठा कभी ना परेशान किया पर फिर भी वही मानव उसके साथ ऐसा कर रहा था।
      जाने कैसे भूल गया वो अपना बचपन जब उसी पेड़ की डालियों पर वो झूलता था,उन्ही के साथ खेलता था। कैसे भूल गया वो पल जब उसी के नीचे आकर बैठता था,उसके मीठे फलो से भूख मिटाता था और छाव से थकान। शायद अब उसकी जरूरतें उस पेड़ से ज्यादा बढ़ गई थी।

 

उस पेड़ के काटने से सिर्फ मैं या वो पेड़ ही उदास नहीं था एक और भी था जो दुखी था पर सिर्फ ऊपर से देख रहा था और कुछ सोच रहा था......

"क्यूँ ढूंढ़ना पड़ता है एक नया साथी "



उस पेड़ की वो नन्ही- नन्ही डालियाँ,
करती थी अठखेलियाँ 
चाँद के साथ....
पीती थी उसकी चांदनी को,
मद्धम मद्धम झूम के
झुलाती थी उसकी किरणों को।  
रात भर
चलता था ये खेल 
और हर नयी सुबह से
वो इंतज़ार करतीं,  
कि चाँद आज रात फिर आएगा।
आज वो डालियाँ
किसी क घर का दरवाज़ा हैं
या किसी के घर का सामान,
पर चाँद का खेल बदस्तूर जारी है
एक नए साथी
एक नए पेड़ के साथ।
इसी सोच में....
कि शायद
कल कोई नया साथी ढूंढ़ना पड़े।